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शान्ति पर्व
अध्याय १०६
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मुनिरु उवाच
उभय़त्र प्रसक्तस्य धर्मे चाधर्म एव च |  १९   क
वलार्थमूलं व्युच्छिद्येत्तेन नन्दन्ति शत्रवः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति