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अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
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वैशम्पाय़न उवाच
स नृपतिरभवत्सदैव ताभ्यः; प्रय़तमना ह्यभिसंस्तुवंश्च गा वै |  ३१   क
नृपधुरि च न गामय़ुङ्क्त भूय़; स्तुरगवरैरगमच्च यत्र तत्र ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति