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शान्ति पर्व
अध्याय १०६
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मुनिरु उवाच
आचरिष्यसि चेत्कर्म महतोऽर्थानवाप्स्यसि |  ३   क
राज्यं राज्यस्य मन्त्रं वा महतीं वा पुनः श्रिय़म् |  ३   ख
यद्येतद्रोचते राजन्पुनर्व्रूहि व्रवीमि ते ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति