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अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
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भगीरथ उवाच
वाजिनां च सहस्रे द्वे सुवर्णशतभूषिते |  २५   क
वरं ग्रामशतं चाहमेकैकस्य त्रिधाददम् |  २५   ख
तपस्वी निय़ताहारः शममास्थाय़ वाग्यतः ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति