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आदि पर्व
अध्याय ११४
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वैशम्पाय़न उवाच
क्रतुस्थला घृताची च विश्वाची पूर्वचित्त्यपि |  ५४   क
उम्लोचेत्यभिविख्याता प्रम्लोचेति च ता दश |  ५४   ख
उर्वश्येकादशीत्येता जगुराय़तलोचनाः ||  ५४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति