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वन पर्व
अध्याय १०६
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लोमश उवाच
असमञ्जा इति ख्यातः सगरस्य सुतो ह्यभूत् |  १०   क
यं शैव्या जनय़ामास पौराणां स हि दारकान् |  १०   ख
खुरेषु क्रोशतो गृह्य नद्यां चिक्षेप दुर्वलान् ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति