वन पर्व  अध्याय १७

वासुदेव उवाच

संनिवेश्य च कौरव्य द्वारकाय़ां नरर्षभ |  ७   क
अभिसारय़ामास तदा वेगेन पतगेन्द्रवत् ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति