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उद्योग पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
स दर्पपूर्णो न समीक्षसे त्व; मनर्थमात्मन्यपि वर्तमानम् |  १२   क
तस्मादहं ते प्रथमं समूहे; हन्ता समक्षं कुरुवृद्धमेव ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति