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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
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हंस उवाच
अज्ञानेनावृतो लोको मात्सर्यान्न प्रकाशते |  ४०   क
लोभात्त्यजति मित्राणि सङ्गात्स्वर्गं न गच्छति ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति