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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
समानय़ानय़ा चेह सहवासमहं कथम् |  ३१   क
गच्छाम्यवुद्धभावत्वादेषेदानीं स्थिरो भवे ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति