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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु सभृत्यवलवाहनः |  १०   क
कुवलाश्वो नरपतिरन्वितो वलशालिनाम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति