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शान्ति पर्व
अध्याय २७२
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महेश्वर उवाच
एष वृत्रो महाञ्शक्र वलेन महता वृतः |  ३४   क
विश्वात्मा सर्वगश्चैव वहुमाय़श्च विश्रुतः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति