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शान्ति पर्व
अध्याय २७३
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व्रह्मो उवाच
रजस्वलासु नारीषु यो वै मैथुनमाचरेत् |  ४४   क
तमेषा यास्यति क्षिप्रं व्येतु वो मानसो ज्वरः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति