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द्रोण पर्व
अध्याय १०६
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सञ्जय़ उवाच
अवक्रगामिभिर्वाणैरभ्यवर्षन्महाय़सैः |  २१   क
द्वैरथे दंशितं यत्तं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति