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भीष्म पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा भीष्मं रणे क्रुद्धं पाण्डवैरभिसंवृतम् |  १   क
यथा मेघैर्महाराज तपान्ते दिवि भास्करम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति