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द्रोण पर्व
अध्याय १०६
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सञ्जय़ उवाच
जघान चतुरश्चाश्वान्सूतं च त्वरितः शरैः |  ५२   क
नाराचैरर्करश्म्याभैः कर्णं विव्याध चोरसि ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति