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द्रोण पर्व
अध्याय १०६
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सञ्जय़ उवाच
ते जग्मुर्धरणीं सर्वे कर्णं निर्भिद्य मारिष |  ५३   क
यथा हि जलदं भित्त्वा राजन्सूर्यस्य रश्मय़ः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति