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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
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हंस उवाच
शिश्नोदरे येऽभिरताः सदैव; स्तेना नरा वाक्परुषाश्च नित्यम् |  ३६   क
अपेतदोषानिति तान्विदित्वा; दूराद्देवाः सम्परिवर्जय़न्ति ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति