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आदि पर्व
अध्याय १०७
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वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातं धृतराष्ट्रस्य यत्नेन महता ततः |  ११   क
सोदरं पातय़ामास गान्धारी दुःखमूर्च्छिता ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति