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अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
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भीष्म उवाच
यथा लवणमम्भोभिराप्लुतं प्रविलीय़ते |  ३१   क
प्राय़श्चित्तहतं पापं तथा सद्यः प्रणश्यति ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति