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आदि पर्व
अध्याय १०७
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वैशम्पाय़न उवाच
व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितैष सुतस्तव |  ३०   क
तस्य शान्तिः परित्यागे पुष्ट्या त्वपनय़ो महान् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति