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आदि पर्व
अध्याय १०७
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जनमेजय़ उवाच
कथं चैकः स वैश्याय़ां धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् |  ४   क
कथं च सदृशीं भार्यां गान्धारीं धर्मचारिणीम् |  ४   ख
आनुकूल्ये वर्तमानां धृतराष्ट्रोऽत्यवर्तत ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति