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वन पर्व
अध्याय १६८
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अर्जुन उवाच
पितामहेन संहारः प्रजानां विहितो ध्रुवम् |  २१   क
न हि युद्धमिदं युक्तमन्यत्र जगतः क्षय़ात् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति