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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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वृत्र उवाच
ऐश्वर्यं तपसा प्राप्तं भ्रष्टं तच्च स्वकर्मभिः |  २७   क
धृतिमास्थाय़ भगवन्न शोचामि ततस्त्वहम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति