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शान्ति पर्व
अध्याय १०७
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राजपुत्र उवाच
आनृशंस्येन धर्मेण लोके ह्यस्मिञ्जिजीविषुः |  ३   क
नाहमेतदलं कर्तुं नैतन्मय़्युपपद्यते ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति