शान्ति पर्व  अध्याय १०७

मुनिरु उवाच

उपपन्नस्त्वमेतेन यथा क्षत्रिय़ भाषसे |  ४   क
प्रकृत्या ह्युपपन्नोऽसि वुद्ध्या चाद्भुतदर्शन ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति