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शान्ति पर्व
अध्याय १०७
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मुनिरु उवाच
यस्त्वं प्रव्रजितो राज्याद्व्यसनं चोत्तमं गतः |  ७   क
आनृशंस्येन वृत्तेन क्षत्रिय़ेच्छसि जीवितुम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति