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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि सकृत्स्पृश्य त्रिरभ्युक्ष्य च मानवः |  १०२   क
कुर्वीत पित्र्यं दैवं च वेददृष्टेन कर्मणा ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति