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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
वृद्धो ज्ञातिस्तथा मित्रं दरिद्रो यो भवेदपि |  १०५   क
गृहे वासय़ितव्यास्ते धन्यमाय़ुष्यमेव च ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति