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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
सन्ध्याय़ां न स्वपेद्राजन्विद्यां न च समाचरेत् |  ११२   क
न भुञ्जीत च मेधावी तथाय़ुर्विन्दते महत् ||  ११२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति