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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
सन्ध्यां न भुञ्जेन्न स्नाय़ान्न पुरीषं समुत्सृजेत् |  १३३   क
प्रय़तश्च भवेत्तस्यां न च किञ्चित्समाचरेत् ||  १३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति