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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
अप्रधृष्यश्च शत्रूणां भृत्यानां स्वजनस्य च |  १३९   क
प्रजापालनय़ुक्तश्च न क्षतिं लभते क्वचित् ||  १३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति