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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
ज्ञातिसम्वन्धिमित्राणि पूजनीय़ानि नित्यशः |  १४४   क
यष्टव्यं च यथाशक्ति यज्ञैर्विविधदक्षिणैः |  १४४   ख
अतऊर्ध्वमरण्यं च सेवितव्यं नराधिप ||  १४४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति