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वन पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
तस्मिन्विप्रद्रुते क्रूरे शाल्वस्याथ चमूपतौ |  १७   क
वेगवान्नाम दैतेय़ः सुतं मेऽभ्यद्रवद्वली ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति