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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
परदारा न गन्तव्याः सर्ववर्णेषु कर्हिचित् |  २०   क
न हीदृशमनाय़ुष्यं लोके किञ्चन विद्यते |  २०   ख
यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति