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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
शिरःस्नातश्च तैलेन नाङ्गं किञ्चिदुपस्पृशेत् |  ३७   क
तिलपिष्टं न चाश्नीय़ात्तथाय़ुर्विन्दते महत् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति