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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तय़िष्यामि यन्मां त्वमनुपृच्छसि |  ४   क
अल्पाय़ुर्येन भवति दीर्घाय़ुर्वापि मानवः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति