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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
त्रीन्कृशान्नावजानीय़ाद्दीर्घमाय़ुर्जिजीविषुः |  ४३   क
व्राह्मणं क्षत्रिय़ं सर्पं सर्वे ह्याशीविषास्त्रय़ः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति