अनुशासन पर्व  अध्याय १०७

भीष्म उवाच

प्रदक्षिणं च कुर्वीत परिज्ञातान्वनस्पतीन् |  ५१   क
चतुष्पथान्प्रकुर्वीत सर्वानेव प्रदक्षिणान् ||  ५१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति