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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
मध्यन्दिने निशाकाले मध्यरात्रे च सर्वदा |  ५२   क
चतुष्पथान्न सेवेत उभे सन्ध्ये तथैव च ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति