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शान्ति पर्व
अध्याय २७३
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आप ऊचुः
त्वं हि देवेश सर्वस्य जगतः परमो गुरुः |  ५१   क
कोऽन्यः प्रसादो हि भवेद्यः कृच्छ्रान्नः समुद्धरेत् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति