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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रय़तेन मय़ा मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ |  १२०   क
दृष्ट्वापरिमितं तस्य प्रभावममितौजसः ||  १२०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति