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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
नित्यमग्निं परिचरेद्भिक्षां दद्याच्च नित्यदा |  ६६   क
वाग्यतो दन्तकाष्ठं च नित्यमेव समाचरेत् |  ६६   ख
न चाभ्युदितशाय़ी स्यात्प्राय़श्चित्ती तथा भवेत् ||  ६६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति