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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
जघान सुरथं नाम द्रुपदस्य सुतं विभुः |  १२६   क
पुनः श्रुतञ्जय़ं नाम सुरथस्यानुजं रणे ||  १२६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति