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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
उदक्षिरा न स्वपेत तथा प्रत्यक्षिरा न च |  ७२   क
प्राक्षिरास्तु स्वपेद्विद्वानथ वा दक्षिणाशिराः ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति