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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
न चानुलिम्पेदस्नात्वा स्नात्वा वासो न निर्धुनेत् |  ७५   क
आर्द्र एव तु वासांसि नित्यं सेवेत मानवः |  ७५   ख
स्रजश्च नावकर्षेत न वहिर्धारय़ेत च ||  ७५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति