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शान्ति पर्व
अध्याय २७५
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समङ्ग उवाच
भूतं भव्यं भविष्यच्च सर्वं सत्त्वेषु मानद |  ५   क
तेषां तत्त्वानि जानामि ततो न विमना ह्यहम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति