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शान्ति पर्व
अध्याय १२०
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भीष्म उवाच
एतान्मय़ोक्तांस्तव राजधर्मा; न्नृणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व |  ५४   क
अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन; सर्वो हि लोकोत्तमधर्ममूलः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति