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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
पाणिं मूर्ध्नि समाधाय़ स्पृष्ट्वा चाग्निं समाहितः |  ९४   क
ज्ञातिश्रैष्ठ्यमवाप्नोति प्रय़ोगकुशलो नरः ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति