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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
पतितैस्तु कथां नेच्छेद्दर्शनं चापि वर्जय़ेत् |  ९९   क
संसर्गं च न गच्छेत तथाय़ुर्विन्दते महत् ||  ९९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति