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वन पर्व
अध्याय २४५
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वैशम्पाय़न उवाच
शुभानुशय़वुद्धिर्हि संय़ुक्तः कालधर्मणा |  २५   क
प्रादुर्भवति तद्योगात्कल्याणमतिरेव सः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति