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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
प्रद्युम्नः परिपप्रच्छ व्राह्मणैः परिकोपितः |  ३   क
किं फलं व्राह्मणेष्वस्ति पूजाय़ां मधुसूदन |  ३   ख
ईश्वरस्य सतस्तस्य इह चैव परत्र च ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति